भारतीय रेल विश्व की गिनी-चुनी रेलों में एक है जो सर्वाधिक यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने का न केवल काम करती है बल्कि इसके अलावा भी वह राष्ट्र की खुशहाली के लिए हर तरह की सेवाएं भी देती है. विगत दिनों खेतों में दौड़ने वाले ट्रैक्टर की एक खेप को अपनी मंजिल तक ले जाते हुए कैमरे के लेंस ने पकडा जो आपके समक्ष प्रस्तुत है…….
Sunday, August 1, 2010
नाव गाड़ी पर या गाड़ी नाव पर
भारतीय रेल विश्व की गिनी-चुनी रेलों में एक है जो सर्वाधिक यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने का न केवल काम करती है बल्कि इसके अलावा भी वह राष्ट्र की खुशहाली के लिए हर तरह की सेवाएं भी देती है. विगत दिनों खेतों में दौड़ने वाले ट्रैक्टर की एक खेप को अपनी मंजिल तक ले जाते हुए कैमरे के लेंस ने पकडा जो आपके समक्ष प्रस्तुत है…….
Thursday, July 8, 2010
पेट्रोल,महंगाई और आम आदमी
पेट्रोल,महंगाई और आम आदमी
शमशेर अहमद खान
महंगाई के विरोध में भारत बंद का आह्वान राजनीतिक पार्टियों द्वारा करके सरकार या जनता के कामों में बाधा डालकर उनको क्षति पहुंचाना लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली में भले ही उनका संवैधानिक अधिकार हो,किंतु महंगाई झेल रही जनता से सहानुभूति लेकर अपनी राजनीति चमकाने की निहित स्वार्थ भावना आम जनता के मनःस्थल में यह सवाल जरूर खडा करती है कि महंगाई से आम जनता को निजात दिलाने के लिए इसके अलावा भी क्या कुछ रास्ते नहीं थे?
सदियों से हमारी यह परंपरा रही है कि निःस्वार्थ होकर हम सहयोगात्मक वृति से सामाजिक कल्याणकारी कार्य करते रहे हैं.जिसे हमारे पूर्वजों ने इसे अपनी दिनचर्या में इस तरह आत्मसात कर लिया जो आगे चलकर भारतीय संस्कृति का एक उपांग ही बन गया. उस सामाजिक कल्याण की भावना से सिद्ध काम में ऐसा कोई निहित स्वार्थ उनका नहीं होता था जैसाकि आजकल है? कुछ ऐसे घटनाक्रम हैं जिनसे अपने पूर्वजों के रास्ते से भटकते हुए हम स्वंय में पर निगाह दौडाने से जवाब मिलता दिखाई देगा.
बात पिछले दिनों की है.बजट सत्र के दौरान एक चैनल ने महंगाई के मुद्दे पर एक कार्यक्रम में मुझे भी दर्शक दीर्घा में आम दर्शक बनकर बहस को सुनने और अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया था.इस चर्चा में सत्ता पक्ष के अलावा तीन अन्य राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों के कद्दावर नेता भी बुलाए गए थे ताकि बहस को पक्ष और विपक्ष दोनों की दृष्टियों से कसा जा सके. आरोप-प्रत्यारोप के बीच गरम-गरमा बहस में जहां खाद्य पदार्थों की जिंसों में चीनी-दाल और सब्जी मुख्य रहीं,वहीं मुझे लगा कि मांसहार के आइटमों को जानबूझकर या सहज रूप में छोडा जा रहा है. संयोग कहें या कुछ और विगत दिनों मैंने अपने आबाई वतन में भारत से नेपाल की दिशा में बड़े-बड़े ट्रकों में जीवित पशुओं को जाते हुए देखा था. सहजता से पता करने पर मालूम हुआ कि ये जीवित पशु पड़ोसी देशों को भेजे जा रहे हैं. दिल्ली लौटने पर जब संबंधित विभाग से पता किया तब मालूम हुआ कि अभी तक देश में जीवित पशुओं के निर्यात के लिए न कोई नीति है और न ही नियम.चूंकि देश की आबादी का एक बडा भाग इसे कंज्यूम करता है, लिहाजा इनकी तस्करी भी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से महंगाई का एक घटक है. कार्यक्रम में सम्मिलित उन सम्मानित नेताओं से इस संबंध में जब सवाल किया तब जवाब तो मिला नहीं.हां,चैनल ने भी वर्तमान पत्रकारिता का धर्म निभाते हुए उस अंश को इडिट जरूर कर दिया. बात आई-गई हो गई.बजट के दौरान उठी महंगाई विस्मृत हो गई.
इधर पेट्रोल के दामों में की गई वृद्धि और इससे होने वाली महंगाई को लेकर उठा विवाद और जन शुभचिंतकों द्वारा किया गया भारत बंद,यह उनका अहम मुद्दा था. शासक और शासित के अपने-अपने तर्क और गणित होते हैं. हमारा मुद्दा यह नहीं है कि दाम बढ़े तो क्यों बढ़े? और न बढ़े तो क्यों न बढ़े? यह विशुद्ध रूप से तकनीकि मामला है. यहां बात मांग और आपूर्ति के परस्पर सिद्धांत की है.कुछ लोगों का यह भी मानना है कि अगर केंद्र और राज्य दोनों मिलकर इसके कुछ कर हटा लें तो निश्चित रूप से पेट्रोल के दाम कम हो जाएंगे और बढ़्ती हुई महंगाई पर अंकुश लग सकता है. गौर करने की बात यह हैकि कुछ राज्यों में उन राजनीतिक पार्टियों की सरकारें भी हैं,जो परस्पर बात कर महंगाई को रोकने की दिशा में सकारात्मक पहल भी कर सकती थीं. खैर,
एक दूसरा पहलू,पिछले दिनों एक दैनिक ने आंकड़ों से यह प्रमाणित कर दिया था कि आगामी कुछ वर्षों में दिल्ली में चार पहिया वाहनों की रफ्तार मात्र दस से बीस किलोमीटर तक सीमित हो जाएगी. यह देखा भी गया है कि दिल्ली में नब्बे प्रतिशत प्राइवेट कारों में एकल सवारियां होती हैं और आज सरकार ने भी सरकारी कर्मचारी की हैसियत इतनी कर दी है कि वह किसी भी रूप में कार ले सकता है.कार लेना हर व्यक्ति का यह न केवल संवैधानिक बल्कि प्राकृतिक अधिकार है भी कि वह कार या कारें रखे.लेकिन ज्वलंत सवाल यह है कि क्या ईंधन के बेजा इस्तेमाल या क्षतिपूर्ति रहित धरती के खनिजों के दोहन का हमारा अधिकार है? कुछ वर्ष पहले टाफलर के इस सिद्धांत पर आधारित उनकी पुस्तक फ्यूचर शाक को अपने शासन काल में इंदिरा जी ने उपसचिव स्तर तक के अधिकारियों को पढ़ने के लिए अनिवार्य कर दिया था. यहां उनकी राजनीति की सच्ची सुगंध और नेकनीयती दिखाई देती है.दर असल हम अपनी वैशिष्टता को त्याज्य कर उपभोगतोन्मुख संस्कृति की ओर ऐसे लालायित हो गए हैं कि लोकोन्मुख संस्कृति की तरफ जाना सरल नहीं रह गया है.फैक्टर जो भी हों.रास्ता हमें ही तलाशना है.अगर मैं स्वंय से शुरु करूं तो मैं अपने आवास से केवल 1.70 रुपए में ही कार्यालय पहुंच सकता हूं,वर्तमान में सार्वजनिक वाहन से कम से कम पंद्रह रुपए लगते हैं.एक रुपए सत्तर पैसे में मैं न केवल अपनी कुछ मुद्राएं बचाकर अन्य महत्वपूर्ण कार्यों की ओर लगा सकता हूं बल्कि इस कार्य से प्रदूषण रहित वातावरण की दिशा में कदम भी रख रहा हूंगा. ऐसी नेकनीयती अगर कार्यालयों के निकट कालोनियों के कर्मचारी कुछ दिन/दिनों/महीने/महीनों के लिए करें तो संभवतः राष्ट्र हित में क्या से क्या न कर चुके होंगे.बात हमेशा ऊपर से नीचे जाती है,इसकी मिसाल लोगों के दिल की धड़कन दिल्ली से क्यों नहीं?राजनीति केवल क्या विरोध से ही होती है या क्या नई संकल्पनाएं नहीं हो सकतीं? यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक घटक का हर दल भी सत्तासीन होता है.
---शमशेर अहमद खान
2-सी,प्रैस ब्लॉक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस, दिल्ली-110054
शमशेर अहमद खान
महंगाई के विरोध में भारत बंद का आह्वान राजनीतिक पार्टियों द्वारा करके सरकार या जनता के कामों में बाधा डालकर उनको क्षति पहुंचाना लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली में भले ही उनका संवैधानिक अधिकार हो,किंतु महंगाई झेल रही जनता से सहानुभूति लेकर अपनी राजनीति चमकाने की निहित स्वार्थ भावना आम जनता के मनःस्थल में यह सवाल जरूर खडा करती है कि महंगाई से आम जनता को निजात दिलाने के लिए इसके अलावा भी क्या कुछ रास्ते नहीं थे?
सदियों से हमारी यह परंपरा रही है कि निःस्वार्थ होकर हम सहयोगात्मक वृति से सामाजिक कल्याणकारी कार्य करते रहे हैं.जिसे हमारे पूर्वजों ने इसे अपनी दिनचर्या में इस तरह आत्मसात कर लिया जो आगे चलकर भारतीय संस्कृति का एक उपांग ही बन गया. उस सामाजिक कल्याण की भावना से सिद्ध काम में ऐसा कोई निहित स्वार्थ उनका नहीं होता था जैसाकि आजकल है? कुछ ऐसे घटनाक्रम हैं जिनसे अपने पूर्वजों के रास्ते से भटकते हुए हम स्वंय में पर निगाह दौडाने से जवाब मिलता दिखाई देगा.
बात पिछले दिनों की है.बजट सत्र के दौरान एक चैनल ने महंगाई के मुद्दे पर एक कार्यक्रम में मुझे भी दर्शक दीर्घा में आम दर्शक बनकर बहस को सुनने और अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया था.इस चर्चा में सत्ता पक्ष के अलावा तीन अन्य राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों के कद्दावर नेता भी बुलाए गए थे ताकि बहस को पक्ष और विपक्ष दोनों की दृष्टियों से कसा जा सके. आरोप-प्रत्यारोप के बीच गरम-गरमा बहस में जहां खाद्य पदार्थों की जिंसों में चीनी-दाल और सब्जी मुख्य रहीं,वहीं मुझे लगा कि मांसहार के आइटमों को जानबूझकर या सहज रूप में छोडा जा रहा है. संयोग कहें या कुछ और विगत दिनों मैंने अपने आबाई वतन में भारत से नेपाल की दिशा में बड़े-बड़े ट्रकों में जीवित पशुओं को जाते हुए देखा था. सहजता से पता करने पर मालूम हुआ कि ये जीवित पशु पड़ोसी देशों को भेजे जा रहे हैं. दिल्ली लौटने पर जब संबंधित विभाग से पता किया तब मालूम हुआ कि अभी तक देश में जीवित पशुओं के निर्यात के लिए न कोई नीति है और न ही नियम.चूंकि देश की आबादी का एक बडा भाग इसे कंज्यूम करता है, लिहाजा इनकी तस्करी भी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से महंगाई का एक घटक है. कार्यक्रम में सम्मिलित उन सम्मानित नेताओं से इस संबंध में जब सवाल किया तब जवाब तो मिला नहीं.हां,चैनल ने भी वर्तमान पत्रकारिता का धर्म निभाते हुए उस अंश को इडिट जरूर कर दिया. बात आई-गई हो गई.बजट के दौरान उठी महंगाई विस्मृत हो गई.
इधर पेट्रोल के दामों में की गई वृद्धि और इससे होने वाली महंगाई को लेकर उठा विवाद और जन शुभचिंतकों द्वारा किया गया भारत बंद,यह उनका अहम मुद्दा था. शासक और शासित के अपने-अपने तर्क और गणित होते हैं. हमारा मुद्दा यह नहीं है कि दाम बढ़े तो क्यों बढ़े? और न बढ़े तो क्यों न बढ़े? यह विशुद्ध रूप से तकनीकि मामला है. यहां बात मांग और आपूर्ति के परस्पर सिद्धांत की है.कुछ लोगों का यह भी मानना है कि अगर केंद्र और राज्य दोनों मिलकर इसके कुछ कर हटा लें तो निश्चित रूप से पेट्रोल के दाम कम हो जाएंगे और बढ़्ती हुई महंगाई पर अंकुश लग सकता है. गौर करने की बात यह हैकि कुछ राज्यों में उन राजनीतिक पार्टियों की सरकारें भी हैं,जो परस्पर बात कर महंगाई को रोकने की दिशा में सकारात्मक पहल भी कर सकती थीं. खैर,
एक दूसरा पहलू,पिछले दिनों एक दैनिक ने आंकड़ों से यह प्रमाणित कर दिया था कि आगामी कुछ वर्षों में दिल्ली में चार पहिया वाहनों की रफ्तार मात्र दस से बीस किलोमीटर तक सीमित हो जाएगी. यह देखा भी गया है कि दिल्ली में नब्बे प्रतिशत प्राइवेट कारों में एकल सवारियां होती हैं और आज सरकार ने भी सरकारी कर्मचारी की हैसियत इतनी कर दी है कि वह किसी भी रूप में कार ले सकता है.कार लेना हर व्यक्ति का यह न केवल संवैधानिक बल्कि प्राकृतिक अधिकार है भी कि वह कार या कारें रखे.लेकिन ज्वलंत सवाल यह है कि क्या ईंधन के बेजा इस्तेमाल या क्षतिपूर्ति रहित धरती के खनिजों के दोहन का हमारा अधिकार है? कुछ वर्ष पहले टाफलर के इस सिद्धांत पर आधारित उनकी पुस्तक फ्यूचर शाक को अपने शासन काल में इंदिरा जी ने उपसचिव स्तर तक के अधिकारियों को पढ़ने के लिए अनिवार्य कर दिया था. यहां उनकी राजनीति की सच्ची सुगंध और नेकनीयती दिखाई देती है.दर असल हम अपनी वैशिष्टता को त्याज्य कर उपभोगतोन्मुख संस्कृति की ओर ऐसे लालायित हो गए हैं कि लोकोन्मुख संस्कृति की तरफ जाना सरल नहीं रह गया है.फैक्टर जो भी हों.रास्ता हमें ही तलाशना है.अगर मैं स्वंय से शुरु करूं तो मैं अपने आवास से केवल 1.70 रुपए में ही कार्यालय पहुंच सकता हूं,वर्तमान में सार्वजनिक वाहन से कम से कम पंद्रह रुपए लगते हैं.एक रुपए सत्तर पैसे में मैं न केवल अपनी कुछ मुद्राएं बचाकर अन्य महत्वपूर्ण कार्यों की ओर लगा सकता हूं बल्कि इस कार्य से प्रदूषण रहित वातावरण की दिशा में कदम भी रख रहा हूंगा. ऐसी नेकनीयती अगर कार्यालयों के निकट कालोनियों के कर्मचारी कुछ दिन/दिनों/महीने/महीनों के लिए करें तो संभवतः राष्ट्र हित में क्या से क्या न कर चुके होंगे.बात हमेशा ऊपर से नीचे जाती है,इसकी मिसाल लोगों के दिल की धड़कन दिल्ली से क्यों नहीं?राजनीति केवल क्या विरोध से ही होती है या क्या नई संकल्पनाएं नहीं हो सकतीं? यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक घटक का हर दल भी सत्तासीन होता है.
---शमशेर अहमद खान
2-सी,प्रैस ब्लॉक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस, दिल्ली-110054
Thursday, June 24, 2010
चलता चला जाऊगा का लोकार्पण
श्री विष्णु प्रभाकर जी के 99वें जन्म दिन के अवसर पर दिल्ली स्थिति हिंदी भवन में श्री विष्णु प्रभाकर जी द्वारा रचित कविता संग्रह चलता चला जाऊगा का लोकार्पण हिंदी मनीषियों के सान्निध्य में सर्वश्री अजित कुमार, डॉ. बलदेव बंशी, डॉ. कृष्ण दत्त पालीवाल,डॉ. हरदयाल,महेश दर्पण,हास्य कवि सुरेश शर्मा, शमशेर अहमद खान,लक्ष्मी शंकर वाजपेयी,डॉ. सुरेश शर्मा के कर कमलों द्वारा सम्पन्न किया गया. इन कविताओं के संकलन के दायित्व का निर्वहन श्री विष्णु जी के सुपुत्र अतुल कुमार जी और प्रकाशन, प्रभात प्रकाशन ने किया है.इस संकलन की भूमिका में हिंदी कविताओं के महान समालोचक श्री अजित कुमार ने लिखा हैश्री विष्णु प्रभाकर से परिचित साहित्य प्रेमी सहसा विश्वास न कर सकेंगे कि कथा-उपन्यास,यात्रासंस्मरण,जीवनी,आत्मकथा,रूपक,फीचर,नाटक,एकांकी,समीक्षा, पत्राचार आदि गद्य विधाओं के लिए ख्यात विष्णु जी ने कभी कविताएं भी लिखी होंगी.लेकिन यह एक सच है.पुस्तक के रैपर पर अतुल जी लिखते हैं कि प्रस्तुत काव्य संकलन में सन 1968 से 1990 की अवधि में उनकी आंतरिक संवेदनाओं को कविता के रूप में संप्रेषित करती उन अभिव्यक्तियों को संकलित करने का प्रयास किया है,जो वे वर्ष में एक या दो बार समाज व मानव की स्थितियों-परिस्थितियों पर कविता के रूप में दीपावली व नववर्ष के संदेश के रूप में अपने चाहने वालों को भेजते रहते थे….मेरे विचार में उनकी कविताओं में प्रेम की अभिव्यक्ति तो है ही, लेकिन उनकी आंतरिक पीडा,आंतरिक इच्छा कि, मनुष्य के अंदर का मनुष्य सच्चे रूप में मानव बन सके और अपने इस जीवन को सार्थक कर सके, की अभिव्यक्ति सबसे ज्यादा मुखर है---पाल ले भले ही दंभ वह, जीतने का प्र्थ्वी को, आकाश को दिग/ दिगंत को,पर/ वह मनुष्य है, मनुष्य ही रहेगा. यही उसकी जीत है, यही उसकी हार है और इसी हार की जीत का नाम है मनुष्य.
कविताओं के बारे में टिप्पणी करते हुए वक्त्तओं ने उन्हें एंटी रोमांटिक मूड में लिखी गई मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन मूल्यों व सामाजिक सरोकारों को दर्शाती संवेदनशील रचनाएं बताईं. एक वक्ता ने 1979 में लिखी गई उनकी एक कविता व्यास और मैं का जिक्र करते हुए यह कहाकि विष्णु जी की कविताएं शाश्वत हैं. आज मनुष्य ने अपने मिथ्या अहम के कारण प्रकृति से जो होड़- लेने की जो व्यर्थ कामना पाल रखी है,इससे मनुष्य का कद बौना ही होता जा रहा है.युगों पहले मनुष्य जब प्रकृति के संरक्षण में था तब उसकी शक्ति असीम थी. आज मनुष्य प्रकृति विजय का दंभ तो भरता है किंतु जलवायु परिवर्तन आदि अनेक ऐसी आपदाएं हैं जिसके आगे वह बौना लगता है, जिसका संकेत विष्णु जी ने अपनी इस कविता में यों व्यक्त किया है--युगों पहले
व्यास ने कहा था—
मनुष्य से बडा कोई नहीं है.
आज
मैं कहता हूं
मनुष्य से छोटा कोई नहीं है.
क्योंकि
मैं मनुष्य हूं
व्यास ऋषि थे.
इस कार्यक्रम का सफल संचालन युवा कवि हर्षवर्धन द्वारा किया गया.
Monday, June 7, 2010
आरोग्यम का लोकार्पण
भारतीय जनमानस को समर्पित आरोग्यम
शमशेर अहमद खान
विगत दिनों भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के सभागार में स्वामी करम वीर जी महाराज द्वारा लिखित आरोग्यम पुस्तक का लोकार्पण डॉ. कर्ण सिंह जी के कर कमलों द्वारा दिल्ली के अति विशिष्ट गणमान्य उपस्थित जनों के बीच संपन्न हुआ.इस समारोह में न केवल चिकित्सा जगत के विश्व स्तर के एलोपैथिक के डॉ. बल्कि सभी चिकित्सा पद्धतियों के ख्याति प्राप्ति सम्मानित चिकित्सक के अलावा प्रशासक, मीडियाकर्मी,लेखक, अधिवक्ता आदि भी इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी रहे.
लोकार्पण समारोह से पूर्व भारतीय संस्कृति की परम्प्रा के अनुसार दीप प्रज्ज्वलित किया गया. तत्पश्चात मन्चासीन अतिथियों ने आरोग्यम पुस्तक पर अपनी-अपनी संक्षिप्त टिप्पणियां दीं.
डॉ. कर्ण सिंह जी ने अपने उद्बोधन में भारतीय चिकित्सा पद्धति की हजारों वर्षों से चली आ रही कल्याणकारी विशेषताओं को आगे भी जनकल्याण हेतु उपयोग पर बल देते हुए स्वामी कर्म वीर जी के इस अवधारणा की सराहनी की कि मनुष्य को बीमारी की दशा में चिकित्सा से पूर्व ही क्यों न ऐसा बना दिया जाय कि वह स्वस्थ रहे जिसे स्वामी जी की पुस्तक में बताया गया है.
स्वामी जी की पुस्तक दो भागों में बंटी है-प्रथम भाग में आठ अध्याय हैं जिनमें प्रमुख अध्याय हैं-आयुर्वेद के मुख्य स्तंभ क्या हैं? भारतीय रसोई-स्वास्थ्य का मुख्य बिंदु,संतुलित आहार क्या है? स्वस्थ जीवन के मूलभूत क्या हैं? कोई बीमारी से कैसे बचाव कर सकता है? और विरोधाभासी भोजन क्या हैं और उनके उदाहरण. और दूसरे भाग में-अनाज और दालें, सब्जियां,दूध और उसका उत्पाद्य,दही और उसका उत्पाद्य,गाय का उत्पाद्य तथा फलों पर चर्चा की गई है.
-2-
अपने वक्तव्य में पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उनकी यह पुस्तक भारतीय पद्धति के अनुसार रसोई से स्वस्थ रहने के सिद्धांत पर बल देती है.
वास्तव में आज जिस प्रकार भारतीय जनमानस के आचार-विचार में परिवर्तन के साथ उसकी भोजन प्रणाली और रहन-स्हन में बदलाव आ रहा है, विशेषकर आने वाली पीढ़ी जो बिना नफा-नुक्सान के वाह्य सभ्यता से प्रभावित होकर भारतीय संस्कारों,जीवन पद्धतियों को त्याग कर नित नए रोग से ग्रसित हो रही है, उसके लिए आवश्यका था कि इस तरह की पुस्तक आए और जो लोगों के बीच मसीहा के रूप में स्वस्थ जीवन के लिए बाइबल का काम करे. देवभूमि हिमालय में अनेक महर्षियों के सत्संग से मिले अमृत की बूंदों को उन्होंने भारत भूमि के बीमार और निराश जनमानस में अपनी दैवी संकल्पनाओं के साथ आरोग्य नामक पुस्तक के माध्यम से अवतरित हुए हैं जो स्वस्थ भारत के निर्माण में संजीवनी का काम करेगी.
पुस्तक के लोकार्पण में पद्म भूषण वैद्य देवेंद्र त्रिगुणा और पद्म भूषण डॉ.एस.पी. अग्रवाल की न केवल सहभागिता थी बल्कि उन्होंने स्वामी जी के उल्लेखनीय इस योगदान की भूरि- भूरि प्रशंसा भी की.
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के निदेशक(प्रकाशन) डॉ. अजय गुप्ता का इस कर्यक्रम के समन्वयन में सराहनीय योगदान रहा.
शमशेर अहमद खान,
2-सी,प्रैस ब्लाक,पुराना,सिविल लाइन, दिल्ली—110054.
दूरभाष-011-23811363/9891502997,9818112411
Saturday, May 22, 2010
कालजयी रचनाकार हैं --अमीर खुसरो

विगत दिनों वरिष्ठ साहित्यकार शमशेर अहमद खान द्वारा लिखित भारत भारती के सच्चे सपूत-अमीर खुसरो शीर्षक पुस्तक का लोकार्पण राज्य सभा के माननीय उप सभापति श्री के. रहमान खान के कर- कमलों द्वारा उनके आवास पर संपन्न हुआ.इस अवसर पर देश के प्रतिष्ठित बुद्धजीवी, विधायक, प्रशासक,साहित्यकार,कवि आदि उपस्थित थे.माननीय उपसभापति जी ने लोकार्पण के उपरांत अमीर खुसरो के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए बताया कि इस बात में कोई संदेह नहीं कि खुसरो साहब हिंदी और उर्दू जबानों के न सिर्फ आदि कवि रहे हैं बल्कि साहित्य और संगीत के कई एक विधाओं के जन्मदाता भी रहे हैं. कई एक वाद्ययंत्रों और छंदों का उन्होंने अविष्कार भी किया. भारतीयता उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी. आज एक अजीब सी स्थिति यह हो गई है कि आज की युवा पीढ़ी खुसरो साहब को नहीं जानती,हमारा फर्ज बनता है कि हम उनके योगदान को न भूलें और युवाओं को उनके बारे में बताएं.मैं शमशेर साहब को मुबारकबाद दूंगा कि उन्होंने मेहनत से उनके सारे टेक्स्ट को एक जगह एकत्रित कर पुस्तक का आकार दिया है .वे इसी तरह और लिखें और ऐसी ही पुस्तकें प्रकाश में आएं.
उन्होंने आगे कहाकि खुसरो उस युग में पैदा हुए थे जब सुल्तानों का शासन हुआ करता था. उस जमाने में उन्होंने हिंदवी की बुनियाद डाली और यहीं से हिंदी और उर्दू दो जबानों का उद्गम हुआ. आज हमें न सिर्फ इन जबानों पर नाज है बल्कि भूमंडलीकरण के इस दौर में दुनिया की ताकतवर देश भी अपनी मार्केटिंग मे लिए इन जबानों का सहारा ले रहे हैं. अमीर खुसरो साहब की जितनी भी तारीफ की जाए वह कम ही होगी. उनका सारा अदब बच्चों से लेकर बड़ों तक न सिर्फ नई सोच देता है बल्कि आपसी मेल-मिलाप,भाईचारा, हुब्बुलवतनी,प्रकृति प्रेम और विश्व बंधुत्व की ओर इशारा करता है. उनकी सारी रचनाएं कालजयी हैं जो हर युग में लागू होती हैं.
इस संगोष्ठी का कुशल संचालन वरिष्ठ पत्रकार श्री एस.एस. शर्मा ने किया.उन्होंने संगोष्ठी में पधारे सीलमपुर क्षेत्र के विधायक श्री मतीन अहमद चौधरी, डॉ. अजय कुमार गुप्ता, जनाब किदवई साहब,प्रकाशक अनिल कुमार शर्मा,पुस्तक के कवर डिजाइनर श्री नरेंद्र त्यागी का विशेष आभार व्यक्त किया.
Saturday, May 8, 2010
डायरी-४--पोर्टब्लेयर,पानी और काला पहाड़
शमशेर अहमद खान
14 मार्च 2010,सर्किट हाउस में थोड़ी सी प्रतीक्षा के बाद श्री सुदीप राय शर्मा जी ने गाड़ी भेज दी है.कल ही तय हो गया था कि आज हम काला पहाड़ देखने जाएंगे और उस जीवनदायिनी परियोजना की प्रगति का आंकलन करेंगे जो पोर्टब्लेयर के लोगों को आगे चलकर उनकी प्यास को बुझाएगी. एअरपोर्ट के बाद हम सिप्पी घाट आ गए हैं.अंडमान का काफी बडा भू-भाग जो कृषि योग्य था, सुनामी के बाद खारे पानी से लबालब भर गया है. यहां न तो नदी है और न तालाब व झील ही, फिर भी मुख्य भूमि का कोई शख्स इसे देखे तो उसे तालाब या झील का भ्रम हो सकता है. सुनामी ने धरती के स्तर को नीचे कर दिया है.देश के नीति निर्धारकों की इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता की कमी का अंदाजा इस बात से भी चलता है कि देश में उन्नत तकनीक होने के बाद भी इस भू-भाग को खारे पानी से मुक्ति क्यों नहीं दिलवाई गई? हमारे साथ राजा और ईश्वर हैं ,जिनमें काफी उत्साह और जोश है.सुपारी,नारियल व अन्य सदाबहार वृक्षों के जंगलों से गुजरते हुए हम गुप्ता पारा पहुंचते हैं.इस तिराहे पर लोगों की आबादी के साथ छोटी सी मार्केट भी है. रास्ते में हमें गौएं दिखाई दी हैं लकिन भैंस के दर्शन दुर्लभ था. पोर्ट्ब्लेयर से निकलते समय वहां की एकमात्र डेरी संयंत्र देखा था जो इन्हीं गौओं के दुग्ध को एकत्रित कर आपूर्ति की जाती है लेकिन यह आपूर्ति लगभग सत्तर प्रतिशत तक हो पाता है, शेष चेन्नै से मिल्क पाउडर के रूप में मंगाकर नागरिकों को पूरा किया जाता है.हल्के नाश्ते और चाय के बाद हम आगे बढ़्ते हैं. आगे सड़्क खराब है.राजा बताते हैं कि सड़्क पर भारी वाहनों के चलने से सड़क की यह दुर्दशा हुई है.किंतु यह सिलसिला ज्यादा नहीं चलता. सड़क के ठीक होने के साथ-साथ सड़क के दोनों तरफ गांव भी दिखते हैं जो पर्यावरणीय दृष्टि से आदर्श गांव कहे जा सकते हैं.कुछ दूर चलने पर राजकीय वन संरक्षित क्षेत्र आ जाता है और हमारे साथ पानी की पाइप लाइन भी दिखती जाती है.संरक्षित वन के समाप्त होते ही सागर शुरु हो जाता है. सामने काला पहाड़ दिखाई दे रहा है मुख्य आइलैंड से काला पहाड़ आइलैंड की दूरी दो-ढाई किलोमीटर से अधिक नहीं होगी लेकिन यह एक विवाद का विषय बन गया है कि काला पहाड़ द्वीप से मुख्य द्वीप पर पाइप लाइन सागर के नीचे से लाई जाए या ऊपर से. राजा और ईश्वर बताते हैं कि मूल परियोजना में दोनों द्वीपों को जोड़्ने वाली पाइप लाइन सागर के नीचे से होनी है.नौसेना भी समुद्र की सतह से पाइप लाइन को जोड़ने पक्ष में है. यहां लोगों की आम धारणा यह है कि ठेके वाली कंपनी अपने निहित स्वार्थ के लिए ओवर ब्रिज द्वारा पाइप लाइन डालने पर जोर दे रही है ताकि इस प्रोजेक्ट में विलंब हो और वह इस बहाने चांदी काट सके.
मुख्य आइलैंड पर लाखों गैलन क्षमता वाला मुख्य टैंक तैयार हो रहा है. मुख्य मिस्त्री बताते हैं कि इसे पूरा होने में लगभग दो महीने का समय लग सकता है बशर्ते इसी गति से काम होता रहे.
देश की मुख्य भूमि की तुलना में यहां आबादी का घनत्व कुछ कम है जिससे उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर संघर्ष कम है और इससे यहां के निवासियों में ये सरल,सहृदय हैं और झूठ,फरेब व मक्कारी से कोसों दूर दिखाई देते हैं.मुख्य भूमि से दूरी होने पर राष्ट्रप्रेम में गुणात्मकता स्पष्ट देखी जा सकती है.
कुछ पलों के विश्राम के बाद हम वहां से वापस हो लिए.रास्ते में लौटते हुए यह निर्णय हुआ कि पानी के प्रोजेक्ट वाली यह यात्रा तो अधूरी ही रहेगी, इसलिए काला पहाड़ भी चला जाए. अब समस्या दो-ढाई किलोमीटर सागर को पार करने की थी. इसका हल भी निकाल लिया,हमारे साथी राजा और ईश्वर ने.संरक्षित वन होने के कारण यहां और काला पहाड़पर टूरिस्टो का आवा-गमन निषेध है इसलिए यहां के लिए जेट्टी नहीं मिलती. स्थानीय निवासी अपना आवा-गमन छोटी-छोटी नौकाओं से करते हैं. इन्हीं छोटी नौकाओं में से एक का प्रबंध उन्होंने एक स्थानीय दुकानदार से बहुत ही मामूली किराए पर करा दिया .
काला पहाड़ द्वीप की सागर की यात्रा वह भी साधारण नौका से रोमांचक थी.नीला- हरा सागर सम्मोहन पैदा कर देता था.आंखेम अपनी सभी सीमाओम को पार कर मन- मस्तिष्क में संचित करने मेम जी जान से जुटी हुइ थीं और ऐगुलियां थीं कि कभी स्टिल तो कभी वीडियो कैमरे को आन-आफ करती जा रही थीं.शरीर की इंद्रियां अपना काम करने पर तुली हुई थीं लेकिन गनीमत थी कि इतना सब होने पर भी यात्रा बेखबर नहीं बल्कि बाखबर रही.
14 मार्च 2010,सर्किट हाउस में थोड़ी सी प्रतीक्षा के बाद श्री सुदीप राय शर्मा जी ने गाड़ी भेज दी है.कल ही तय हो गया था कि आज हम काला पहाड़ देखने जाएंगे और उस जीवनदायिनी परियोजना की प्रगति का आंकलन करेंगे जो पोर्टब्लेयर के लोगों को आगे चलकर उनकी प्यास को बुझाएगी. एअरपोर्ट के बाद हम सिप्पी घाट आ गए हैं.अंडमान का काफी बडा भू-भाग जो कृषि योग्य था, सुनामी के बाद खारे पानी से लबालब भर गया है. यहां न तो नदी है और न तालाब व झील ही, फिर भी मुख्य भूमि का कोई शख्स इसे देखे तो उसे तालाब या झील का भ्रम हो सकता है. सुनामी ने धरती के स्तर को नीचे कर दिया है.देश के नीति निर्धारकों की इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता की कमी का अंदाजा इस बात से भी चलता है कि देश में उन्नत तकनीक होने के बाद भी इस भू-भाग को खारे पानी से मुक्ति क्यों नहीं दिलवाई गई? हमारे साथ राजा और ईश्वर हैं ,जिनमें काफी उत्साह और जोश है.सुपारी,नारियल व अन्य सदाबहार वृक्षों के जंगलों से गुजरते हुए हम गुप्ता पारा पहुंचते हैं.इस तिराहे पर लोगों की आबादी के साथ छोटी सी मार्केट भी है. रास्ते में हमें गौएं दिखाई दी हैं लकिन भैंस के दर्शन दुर्लभ था. पोर्ट्ब्लेयर से निकलते समय वहां की एकमात्र डेरी संयंत्र देखा था जो इन्हीं गौओं के दुग्ध को एकत्रित कर आपूर्ति की जाती है लेकिन यह आपूर्ति लगभग सत्तर प्रतिशत तक हो पाता है, शेष चेन्नै से मिल्क पाउडर के रूप में मंगाकर नागरिकों को पूरा किया जाता है.हल्के नाश्ते और चाय के बाद हम आगे बढ़्ते हैं. आगे सड़्क खराब है.राजा बताते हैं कि सड़्क पर भारी वाहनों के चलने से सड़क की यह दुर्दशा हुई है.किंतु यह सिलसिला ज्यादा नहीं चलता. सड़क के ठीक होने के साथ-साथ सड़क के दोनों तरफ गांव भी दिखते हैं जो पर्यावरणीय दृष्टि से आदर्श गांव कहे जा सकते हैं.कुछ दूर चलने पर राजकीय वन संरक्षित क्षेत्र आ जाता है और हमारे साथ पानी की पाइप लाइन भी दिखती जाती है.संरक्षित वन के समाप्त होते ही सागर शुरु हो जाता है. सामने काला पहाड़ दिखाई दे रहा है मुख्य आइलैंड से काला पहाड़ आइलैंड की दूरी दो-ढाई किलोमीटर से अधिक नहीं होगी लेकिन यह एक विवाद का विषय बन गया है कि काला पहाड़ द्वीप से मुख्य द्वीप पर पाइप लाइन सागर के नीचे से लाई जाए या ऊपर से. राजा और ईश्वर बताते हैं कि मूल परियोजना में दोनों द्वीपों को जोड़्ने वाली पाइप लाइन सागर के नीचे से होनी है.नौसेना भी समुद्र की सतह से पाइप लाइन को जोड़ने पक्ष में है. यहां लोगों की आम धारणा यह है कि ठेके वाली कंपनी अपने निहित स्वार्थ के लिए ओवर ब्रिज द्वारा पाइप लाइन डालने पर जोर दे रही है ताकि इस प्रोजेक्ट में विलंब हो और वह इस बहाने चांदी काट सके.
मुख्य आइलैंड पर लाखों गैलन क्षमता वाला मुख्य टैंक तैयार हो रहा है. मुख्य मिस्त्री बताते हैं कि इसे पूरा होने में लगभग दो महीने का समय लग सकता है बशर्ते इसी गति से काम होता रहे.
देश की मुख्य भूमि की तुलना में यहां आबादी का घनत्व कुछ कम है जिससे उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर संघर्ष कम है और इससे यहां के निवासियों में ये सरल,सहृदय हैं और झूठ,फरेब व मक्कारी से कोसों दूर दिखाई देते हैं.मुख्य भूमि से दूरी होने पर राष्ट्रप्रेम में गुणात्मकता स्पष्ट देखी जा सकती है.
कुछ पलों के विश्राम के बाद हम वहां से वापस हो लिए.रास्ते में लौटते हुए यह निर्णय हुआ कि पानी के प्रोजेक्ट वाली यह यात्रा तो अधूरी ही रहेगी, इसलिए काला पहाड़ भी चला जाए. अब समस्या दो-ढाई किलोमीटर सागर को पार करने की थी. इसका हल भी निकाल लिया,हमारे साथी राजा और ईश्वर ने.संरक्षित वन होने के कारण यहां और काला पहाड़पर टूरिस्टो का आवा-गमन निषेध है इसलिए यहां के लिए जेट्टी नहीं मिलती. स्थानीय निवासी अपना आवा-गमन छोटी-छोटी नौकाओं से करते हैं. इन्हीं छोटी नौकाओं में से एक का प्रबंध उन्होंने एक स्थानीय दुकानदार से बहुत ही मामूली किराए पर करा दिया .
काला पहाड़ द्वीप की सागर की यात्रा वह भी साधारण नौका से रोमांचक थी.नीला- हरा सागर सम्मोहन पैदा कर देता था.आंखेम अपनी सभी सीमाओम को पार कर मन- मस्तिष्क में संचित करने मेम जी जान से जुटी हुइ थीं और ऐगुलियां थीं कि कभी स्टिल तो कभी वीडियो कैमरे को आन-आफ करती जा रही थीं.शरीर की इंद्रियां अपना काम करने पर तुली हुई थीं लेकिन गनीमत थी कि इतना सब होने पर भी यात्रा बेखबर नहीं बल्कि बाखबर रही.
डायरी-३-पोर्टब्लेयर की गलियों में पानी की तलाश
शमशेर अहमद खान
13मार्च 2010,को मुझे सर्किट हाउस में काफी समय तक रहना पडा क्योंकि कल की चर्चा में यह निश्चित किया गया था कि शहर की पीने की पानी की वास्तविक समस्याओं से कोई भी बाहरी व्यक्ति तभी पूरी तरह वाकिफ हो सकता है जब वह उन संसाधनों और उन स्थलों की पूरी तरह जांच करे और लोगों से रूबरू हो सके. इस काम के लिए वहां के निगम के चेयर मैन साहब ने वाहन उपलब्ध करवाने का आश्वासन भी दिया था और हमारे साथ एक सहायक अभियंता को भी साथ लगा दिया था.अब उन्हीं का इंतजार जो कटने का नाम ही नहीं ले रहा था.समय तेजी से भागा जा रहा था और हालत ऐसी हो रही थी कि घर के रहे थे और न घाट के. साथ में आया पुत्र भी अब बोर होने लगा था हम आए थे पर्यटन के इरादे से और काम कर रहे थे सामाजिक सेवा का. पहले तो वह कुछ हिचकिचा रहा था लेकिन हमारा यह काम उसे भी रास आने लगा था. आखिर वह छात्र बी.ए. अंतिम वर्ष का है और वह भी दिल्ली विश्वविद्यालय जैसी प्रख्यात संस्था का, जिसे आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर के बुद्धजीवी पैदा करने का श्रेय हासिल है. वह कुछ और सोचता कि मैंने स्वयं आगे बढ़ कर निगम कार्यालय जाने का निर्णय लिया. जैसाकि पहले भी बताया जा चुका है कि पोर्टब्लेयर में आप मुश्किल से दस मिनट में एक सिरे से दूसरे सिरे तक दस मिनट में पहुंच सकते हैं. देश की एकमात्र ऐसी राजधानी है जहां कभी जाम से वास्ता नहीं ही पड़ सकता है. देश के लिए गौरव की बात हो सकती है. खैर जब हम वहां पहुंचे तो पता चला कि जिस सहायक अभियंता को हमारे साथ लगाया गया था ,अचानक रात में उनकी तबियत खराब हो गई. फिर भी वे मार्च का महीना होने के कारण केवल कुछ पलों के लिए ही आए थे और निकलने वाले थे.जाते-जाते उन्होंने एक पार्षद से परिचय भी करा गए जो आगे चलकर एक आइकन साबित हुए.
इन पार्षद महोदय का नाम श्री सुदीप राय शर्मा है जो न केवल पार्षद हैं बल्कि एक सच्चे समाज सेवी हैं. सुनामी से लेकर आज तक अपने खुद के टैंकरों से बस्तियों में पानी देते हैं.उनको आज मछली बाजार में पानी देना था लिहाजा वे इस अवसर पर आने का आमंत्रण भी देते हैं जिसे हम लोग सहर्ष स्वीकार लेते हैं.
हम शहर के अलग-अलग भागों में जाते हैं जहां कार्पोरेशन की टंकियां हैं. इन्हीं टंकियों के साथ एन.बी.सी.सी. की टंकियां भी खड़ी हैं .पुरानी टंकियों में पानी नहीं है.दो दिनों में जब टंकी भरती है तब उसी समय वार्ड में पानी छोड़ देते हैं. सरकारी अदूरदर्शिता की साक्षी एन.बी.सी.सी. की टंकियां हैं जिनपर करोड़ों रुपए व्यय किए गए हैं और पानीका नामोनिशान तक नहीं है. कई वार्डों का हम दौरा करते हैं और हकीकत में यहां तीन महीने पीने के पानी की विकराल समस्या हमें ज़मीनी सतह पर खुद बयां करती नज़र आती है. अभी हमार दौरा समाप्त हुआ ही था कि सुदीप जी का फोन आ गया कि हम मछली बाजार पहुंच जाएं, टैंकर आ गया है. लोग कतार में पानी बड़े ही अनुशासित तरीके से ले रहे हैं. टैंकर पानी देता हुआ आगे बढ़्ता जाता है. निगम के पानी में तो लोग मार्पीट कर लें लेकिन यहां चूं तक नहीं होती. आखिर् जो पानी के मसीहा जो साथ हैं.
इसके बाद हम जंगली चट्टी देखते है जो मछली बाजार के साथ लगा हुआ इलाका है. यहां सुनामी के विध्वंस के चिह्न आज भी देखे जा सकते हैं.इस घाव को भरने में समय को और समय की जरूरत है.
हम आगे बढ़्ते हैं.अंडमान की जीवन रेखा कही जाने वाली जहाजरानी की गोदी साथ में है. यहां के लिए पानी की आपूर्ति की व्यवस्था ालग से कर रखी गई है. इसी चैथम लाइन से लगा हुआ एक द्वीप है जो आरा मशीन के लिए प्रसिद्ध है. ऐसा कहा जाता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यहां एशिया का सबसे बडा आरा मशीन से लकड़ी काटने का कारोबार हुआ करता था लेकिन अब सोया पडा है.बात सच है इस द्वीप ने अपने कल से जो अंदमान के पर्यावरण की दुर्दशा की, उसकी भरपाई करने में सदियां लग जाएंगी.
Friday, May 7, 2010
डायरी- पोर्ट ब्लेयर की तरफ कूच
शमशेर अहमद खान
12 मार्च,2010 कोलकाता के दमदम हवाई अड्डे के डार्मेट्री में एकाएक नींद उचट गई. देखा साढे तीन बजने वाले थे.साढ़े पांच बजे फ्लाइट की उडान का समय था, साढ़े चार बजे एअर पोर्ट पर रिपोर्ट कर अनेक औपचारिकताएं पूरी करनी थीं,लिहाजा समय आ गया था कि दैनिक क्रिया से निवृत होकर सामान समेटा जाए. रिटायरिंग रूम से नीचे आकर चाय ली.चाय का आदमी के जीवन से कितना गहरा संबंध हो गया है कि बिना इसके होठों के आलिंगन से दिन का मुहूर्त ही नहीं होता. उनींदे एअर पोर्ट पर शांत वातावरण में चाय की चुस्कियों का मजा ही कुछ और था.सी.आर..पी.एफ. के जिस जवान को मैं चाय आफर करता हूं, वे शालीनता से मना कर देते हैं.बताते हैं इतनी मंहगी चाय की अपेक्षा वे बाहर जाकर चाय पीना पसंद करेंगे.और फिल्हाल उन्हें चाय की तलब भी नहीं है. रात भर जागकर निश्चिंत होकर सोने का अवसर इस नौजवान ने हमें उपलब्ध करवाया है. हालांकि उसने अपनी ड्यूटी निभाई है लेकिन मेरा विवेक था कि मैने इंसानियत का फर्ज मानते हुर चाय का ऑफर दिया था. इसमें लोगों के अपने-अपने ख्यालात हो सकते हैं और हर को अपने ढंग से सोचने और रियक्ट करने का पूरा अधिकार है भी.चाय की चुस्कियों के बीच में ईमानदारी की कमाई की बात चल निकली.कुछ क्षणोम की आनंदानुभूति के बाद हम यथार्थ की दुनिया में आ गए. समय तेजी से भागा जा रहा था और मुझे सामान समेट कर नीचे एअरपोर्ट पर रिपोर्ट करना था. हम यथा समय तैयार होकर नीचे आ गए. हवाई जहाज निर्धारित सम्य पर जहां उडा वहीं वह अपने निर्धारित समय पर पहुंच भी गया. अंडमान द्वीप समूह के पोर्टब्लेयर का इकलौता हवाई अड्डा अहसास करा गया कि यहां की दुनिया जिंदगी के भागम-भाग से काफी दूर है.लेकिन इसकी धड़कन में भारत बसा है.लाउंज में आते ही मेरे नाम की प्लेट लिए एक सज्जन खड़े मिले.कुछ ही मिनटों में हम सर्किट हाउस में थे. सर्किट हाउस में ठहरने की व्यवस्था हमने दिल्ली से ही करवा रखी थी इसलिए पोर्टब्लेयर में ठहरने की व्यवस्था को लेकर ऊहा-पोह की कोई समस्या नहीं थी. जहां तक गाडी की व्यवस्था की बात थी तो इसका प्रबंध माननीय सांसद श्री विष्णु पद रे के स्थानीय प्रतिनिधि श्री सवण्णा ने किया था जो स्थानीय सागर दैनिक का प्रकाशन करते हैं.
कुछ विराम के बाद हमने श्री सवण्णा से भेंट करने का निर्णय लिया ताकि अगला कार्यक्रम तय किया जा सके. जाहिर है कि अब मेरी पहली प्राथमिकता अंडमान की समस्या को लेकर थी और पर्यटन कार्यसूची में दूसरे नंबर पर आ गया था.
नीले शांत स्फटिक जैसे पारदर्शी समुद्र को देखकर धरती की दूसरी जन्नत का आभास हो सकता है. पोर्टब्लेयर के सागर तटों को देखकर यह आभास नहीं हो सकता कि 2004 में इस शहर ने सुनामी को झेला होगा.लोगों की अपने शहर को अच्छा बनाए रखने की रुचि, केंद्रीय प्रशासन की सहायता और पूरे देश की जनता के हमदर्दाना रवैए ने इसे जो खूबसूरती प्रदान की है वह शब्दों में बांधना थोडा कठिन होगा.कम आबादी वाले साफ-सुथरे शहर में आटो की यात्रा भी काफी आनंदायक होती है. हिंदी भाषी आटो चालक ने कब गोलमार्केट पहुंचा दिया,समय का पता ही नहीं लगा.
सवण्णा जी से वहां की समस्याओं पर गंभीरता से हम परस्पर विचार करते रहे.पहला मुद्दा जो उभरकर आया वह यह था कि हालांकि सरका्र ने इसे पर्यटन के रूप में विकसित किया है और इसकी इकोनामी पर्यटन पर आधारित है लेकिन मूल निवासियों की तीन महीने जल संकट की समस्या काफी गंभीर है जिसपर निजात पाना जरूरी है.पोर्टब्लेयर नगर निगम के अध्यक्ष श्री जय कुमार नायर से मिलने की बात उठती है ताकि इस समस्या की जड़ और निदान तक पहुंचा जा सके.कुछ इंतजार के बाद मुलाकात का समय तय होता है और हम सब निगम के कर्यालय में होते हैं.
पोर्टब्लेयर के चारों तरफ हालांकि अगाध स्फटिक जैसी पारदर्शी जलराशि है लेकिन सागर की यह जलराशि केवल नौकायन जैसे कामों तक ही सीमित है. पोर्टब्लेयर में न तो नदी है और न झील. भूजल थोडा- बहुत है किंतु पीने का सारा पानी रेन हार्वेस्टिंग द्वारा होता है. यद्दपि यहां औसत वर्षा तीन सौ सेंटीमीटर सालाना है लेकिन सागर की भंडारण क्षमता केवल नौ महीने तक ही आपूरित कर पाती है तीन महीने इस द्वीप पर पानी की राशनिंग होती है और दो या तीन दिनों में बीस मिनट ही पीने का पानी मिल पाता है. सरकार ने कुछ योजनाएं यद्दपि बनाई हैं किंतु वे सफेद हाथी ही साबित हो रही हैं .एन.्बी.सी.सी. ने कई एक टंकियां खड़ी कर दी किंतु खाली टंकियां पानी से आपूरित नहीं हो सकीं और सरकार का करोड़ों रूपए फिल्हाल बेकार साबित हो रहा है. उच्च भूकंपीय क्षेत्र में होने के कारण बांध को भी ऊचा करना तर्कसंगत नहीं लगता.लिहाजा एक बहुत ही बुद्धिमतापूर्ण कदम सरकार ने यह उठाया कि वहां पानी की समस्या का निदान पड़ोसी द्वीप काला पहाड़ से पाइप लाइन द्वारा लाकर यहां जोड़ दी जाए.
काला पहाड़ एक निम्नतम आबादी वाला द्वीप है जहां सघन वनों के बीच इतना पानी है कि अपने पड़ोसी द्वीप के लोगों की प्यास को पूरे साल बुझा सकता है.
इन्हीं मुद्दों पर हमारी चर्चा होती रही. इस चर्चा में पार्षद शेर सिंह, सुदीप राय शर्मा और निगम के कर्मचारी और अधिकारी भी शामिल हुए जिनसे अनेक तथ्य प्रकाश में आए.
डायरी- दिल्ली से कोलकाता
शमशेर अहमद खान
निर्धारित समय पर हम इंदिरागांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंच गए.जब से इंडियन एअर लाइंस और एअर इंडिया का विलीनीकरण हुआ है तब से घरेलू उडान की यह मेरी पहली यात्रा है.जुलाई 2007 में मैंने एरोफ्लोट में दिल्ली से न्यूयार्क की यात्रा की थी और उस अंतर्राष्ट्रीय उडान में जो उस समय सबसे सस्ती और आरामदायक थी,प्रशंसा का पात्र बनी थी.सरकार ने इकोनामी क्लास में जहां सरकारी निधि में बचत के लिए वरिष्ठतम मंत्रियों को इकोनामी क्लास में यात्रा करने के लिए प्रेरित किया है, वहीं सरकारी कर्मचारियों के लिए निचले क्रम के अधिकारियों को भी हवाई यात्रा करने की सीमा में डालकर घरेलू उडान में उसकी इकोनामी को मजबूत करने का उपक्रम किया है. दोनों उपक्रमों के विलीनीकरण के उपरांत घरेलू उडान में निखार आ गया है.इसी उडान क्रमांक आई.सी.264 को ही लें. एअर बस अंतर्राष्ट्रीय स्तर की है, जो सुविधाएं एअरो फ्लोट में नहीं थीं,वह अब हमारी घरेलू उडानों की इन फ्लाईटों में दिखाई दे रहीं हैं. लोगों को विकास अगर न दिखाई दे तो इसके लिए क्या किया जा सकता है.वैसे सच कहा जाए तो असंतुष्टि ही विकास की शृंखला की एक कड़ी है. लगभग दो घंटे की यात्रा कब खत्म हुई, समय का पता ही न चला. वातावरण के जिस लेयर में हवाई जहाज उड़ रहा था, वहां धूल कण का नामो निशान तक नहीं है. बादलों के ऊपर और सूर्यास्त का दृश्य और नारंगी रंग की आभा सम्मोहन खडा कर देती है. मेरे बाजू में बैठे हुए सहयात्री को जो आनन्दानुभूति हो रही है वही मेरे बेटे और मुझे भी हो रही है.इसी फ्लाइट में हमारे साथी सरोज मिल गए हैं जो दिल्ली से कोलकाता वापस लौट रहे हैं, काफी अरसे बाद सरकारी बैठक के सिलसिले में आए हैं और यह महज संयोग है कि उनसे एअर बस में मुलाकात हो रही है.
मुझे पोर्ट ब्लेयर जाना है और फ्लाइट प्रातः 5 बजे पकड़नी है,लिहाजा कहां जाऊं, ऊहापोह की स्थिति है.मेरा उसूल रहा है कि कम से कम संसाधनों का उपयोग करते हुए अधिकतम सेवाएं दी या ली जाएं. लिहाजा मैं व्यक्तिगत रूप से इकोनामी बरतना चाहता हूं. कोलकाता मैं पहली बार आया हूं और मुझे शहर के मिजाज यानी यातायात व्यवस्था की कोई जानकारी नहीं है लिहाजा राय बनती है कि हम एअरपोर्ट पर ही ठहर जाएं. हमें यह कतई संकोच नहीं होना चाहिए कि हम यह मान चुके हैं कि हम सब लगभग बेईमान हैं लेकिन ऐसा नहीं है खासकर केंद्रीय एजेंसियां अभी ईमानदारी के शिखर को छू रही हैं. मैं जिस अधिकारी से डारमेंट्री बुक कराना चाहता हूं. वे दो मिनट रुकने के लिए कहते हैं.उनके हाथ में एक पर्स है जिसमें हजारों रूपए, क्रेडिट कार्ड और मोबाइल भी है. एअरपोर्ट परिसर में के.औ.सु.ब. को चौकसी का दायित्व सौंपा गया है, अनूप ने जिस ईमानदारी का सबूत देते हुए अपने सीनियर को सौपा है, यह गर्व की बात है.वह बताता है कि लोग अक्सर जल्दी में अपना कीमती सामान भूल जाते हैं लेकिन उनका सामान यहां जमा कर दिया जाता है,यही तो हमारा कर्तव्य है साहब.
इकोनामी बरतते हुए मैंने एक बेड बुक करा लिया है जिसके लिए मुझे 225 रुपए देने पड़े हैं, आज रात मुझे बैठ कर गुजारनी पड़ी है जो देश के इकोनामी के नाम है.लेकिन हर इंडीविजुअल खुद फैसला करने का मुस्तहक है कि वह क्या करना पसंद करे. फैसला आप का.
मुझे पोर्ट ब्लेयर जाना है और फ्लाइट प्रातः 5 बजे पकड़नी है,लिहाजा कहां जाऊं, ऊहापोह की स्थिति है.मेरा उसूल रहा है कि कम से कम संसाधनों का उपयोग करते हुए अधिकतम सेवाएं दी या ली जाएं. लिहाजा मैं व्यक्तिगत रूप से इकोनामी बरतना चाहता हूं. कोलकाता मैं पहली बार आया हूं और मुझे शहर के मिजाज यानी यातायात व्यवस्था की कोई जानकारी नहीं है लिहाजा राय बनती है कि हम एअरपोर्ट पर ही ठहर जाएं. हमें यह कतई संकोच नहीं होना चाहिए कि हम यह मान चुके हैं कि हम सब लगभग बेईमान हैं लेकिन ऐसा नहीं है खासकर केंद्रीय एजेंसियां अभी ईमानदारी के शिखर को छू रही हैं. मैं जिस अधिकारी से डारमेंट्री बुक कराना चाहता हूं. वे दो मिनट रुकने के लिए कहते हैं.उनके हाथ में एक पर्स है जिसमें हजारों रूपए, क्रेडिट कार्ड और मोबाइल भी है. एअरपोर्ट परिसर में के.औ.सु.ब. को चौकसी का दायित्व सौंपा गया है, अनूप ने जिस ईमानदारी का सबूत देते हुए अपने सीनियर को सौपा है, यह गर्व की बात है.वह बताता है कि लोग अक्सर जल्दी में अपना कीमती सामान भूल जाते हैं लेकिन उनका सामान यहां जमा कर दिया जाता है,यही तो हमारा कर्तव्य है साहब.
इकोनामी बरतते हुए मैंने एक बेड बुक करा लिया है जिसके लिए मुझे 225 रुपए देने पड़े हैं, आज रात मुझे बैठ कर गुजारनी पड़ी है जो देश के इकोनामी के नाम है.लेकिन हर इंडीविजुअल खुद फैसला करने का मुस्तहक है कि वह क्या करना पसंद करे. फैसला आप का.
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