कितनी विचित्र विडम्बना है कि लोगों का मित्र जो आपके शत्रुओं से आपकी रक्षा करे, उसे आप बतौर गाली लें.जी हां, बात हो रही है उलूक की. जब आप गहरी नींद मेम होते हैं तब शत्रु कीटों,जंतुओं से आपकी रक्षा यही उलूक ही करते हैं.भारतीय पौराणिक कथाओं में देवी लक्ष्मी के वाहक यही हैं. एक रात हमने भी उनके सा्थ यों गुजारी---आप भी देखें तस्वीरों की जबानी.....
Saturday, June 27, 2009
उलूक
कितनी विचित्र विडम्बना है कि लोगों का मित्र जो आपके शत्रुओं से आपकी रक्षा करे, उसे आप बतौर गाली लें.जी हां, बात हो रही है उलूक की. जब आप गहरी नींद मेम होते हैं तब शत्रु कीटों,जंतुओं से आपकी रक्षा यही उलूक ही करते हैं.भारतीय पौराणिक कथाओं में देवी लक्ष्मी के वाहक यही हैं. एक रात हमने भी उनके सा्थ यों गुजारी---आप भी देखें तस्वीरों की जबानी.....
Saturday, June 13, 2009
Sunday, June 7, 2009
गिलहरी का ममत्व
केले के पेंड़ में फूल खिला और कुछ दिनों में उसमें फल भी लगे. गिलहरी ने एक-एक रेशा जोड़्कर अपना घोंसला बनाया.ज्यों-ज्यों केले के फल बढ़्ते गए घोंसला सिकुड़्ता गया. गिलहरी ने उसमें बच्चे दिए. बंदरों ने केले के पेड़ को तोड़ दिया. केले के घर के साथ ही गिलहरी का घोंसला बच्चों सहित जमीन पर आ गिरा' माली ने केले के घर से घोंसला बाहर कर दिया . गिलहरी अपने बच्चे को एक-एक कर सुरक्षित स्थान पर ले गई. इसी को कहते हैं मां का ममत्व.-शमशेर अहमद खान
रिपोर्ट
हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य संगोष्ठी संपन्न
शमशेर अहमद खान
विगत दिनों उत्तरप्रदेश भाषा संस्थान, लखनऊ और भारतीय साहित्य सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वाधान में राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी का आयोजन भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ,नई दिल्ली
स्थिति आजाद भवन के मल्टीपर्पज हॉल में संपन्न हुआ.एक पूर्ण दिवसीय संगोष्ठी का उद्घाटन डॉ. कन्हैया लाल नंदन ने किया. इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्री वीरेंद्र गुप्त जी थे किंतु किंही कारणवश वे उपलब्ध न थे इसलिए उनका प्रतिनिधित्व डॉ.अजय गुप्ता जी ने किया.इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. राजेंद्र अवस्थी जी ने की.
बाल साहित्य की वर्तमान दशा और दिशा पर चिंतनपरक आलेख पढ़ने वाले विद्वानों में डॉ. हरिकृष्ण देवसरे,डॉ. राजेंद्र अवस्थी,डॉ. अलका पाठक,डॉ. शेरजंग गर्ग,डॉ. द्रोणवीर कोहली,डॉ. सूर्यकुमार पाण्डेय आदि प्रमुख थे.
बालसाहित्य से संबंधित पढ़े गए आलेखों में डॉ. अलका पाठक का लेख काफी संतुलित रहा. उन्होंने हास्य-हास्य में वह सब कुछ कह दिया जिसे चिंतनपरक संगोष्ठी में विचार किया जाता है. वे अपने आलेख का अंत करते हुए कहती हैं----“ वही पीछे छूटा बचपन जब पच्चीसबरस, पचास बरस बाद अपने बच्चे या बच्चे के बच्चे के रूप में खडा हो जाता है तो यह जरूरी एवरेस्ट यह आवश्यक सागर सिकुड़ते हैं और छोटे होते जाते हैं,इतने –इतने छोटे कि नन्हीं- नन्हीं हथेलियों में राजा जी की गैया खो जाती है, मिलती है गुदगुदी में, खिलखिलाहट में—आटे बाटे चने चटाके,चैंऊ-मैऊ, झू झू के पाऊं कर के और वही सवाल कि चल चल चमेली बाग में क्या- क्या खिलाएंगे; सूरज एक पूरा चक्कर लगाकर सुबह- दोपहर शाम को रूप बदलने के बाद फिर वहीं से शुरू हो गई कहानी…. कुछ बदला तो था पर बदला हुआ गया कहां ! वही बच्चा, वही कहानी, वही नानी और एक था राजा , एक थी रानी. दोनों मर गए खत्म कहानी.”
इस संगोष्टी में बालसाहित्य संबंधी उठाए गए मुद्दे बच्चों के भविष्य की ओर इंगत करते थे.एक तरफ जहां सूचना एवं प्रौद्योगिकि की क्रांति से उपजी सूचनापरकता माध्यमों के साहित्य में प्रयोग की बात थी वहीं भारत के उन नौनिहालों कि चिंता थी जिन्हें स्कूल का मुंह भी देखने को नसीब नहीं होता ऐसे में बालसाहित्य की दशा और दिशा निर्धारित करना बेमानी लगता है. चूकि इस दिशा में समग्र रूप से कोई समेकित कार्य नहीं हुआ है इसलिए हर कोई अपनी ढ्पली अपना राग गाए चला जा रहा है. फिर भी अंधेरी रात में जुगनू की चमक ही भरपूर लगती है. लेकिन फिर भी अगर-मगर करते हुए चला जाय तो मंजिल मिलेगी ही मिलेगी.
शमशेर अहमद खान, 2-सी, प्रैस ब्लाक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस दिल्ली---110054.
Shamsher_53@rediffmail.com, ahmedkhan.shamsher@gmail.com
हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य संगोष्ठी संपन्न
शमशेर अहमद खान
विगत दिनों उत्तरप्रदेश भाषा संस्थान, लखनऊ और भारतीय साहित्य सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वाधान में राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी का आयोजन भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ,नई दिल्ली
स्थिति आजाद भवन के मल्टीपर्पज हॉल में संपन्न हुआ.एक पूर्ण दिवसीय संगोष्ठी का उद्घाटन डॉ. कन्हैया लाल नंदन ने किया. इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्री वीरेंद्र गुप्त जी थे किंतु किंही कारणवश वे उपलब्ध न थे इसलिए उनका प्रतिनिधित्व डॉ.अजय गुप्ता जी ने किया.इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. राजेंद्र अवस्थी जी ने की.
बाल साहित्य की वर्तमान दशा और दिशा पर चिंतनपरक आलेख पढ़ने वाले विद्वानों में डॉ. हरिकृष्ण देवसरे,डॉ. राजेंद्र अवस्थी,डॉ. अलका पाठक,डॉ. शेरजंग गर्ग,डॉ. द्रोणवीर कोहली,डॉ. सूर्यकुमार पाण्डेय आदि प्रमुख थे.
बालसाहित्य से संबंधित पढ़े गए आलेखों में डॉ. अलका पाठक का लेख काफी संतुलित रहा. उन्होंने हास्य-हास्य में वह सब कुछ कह दिया जिसे चिंतनपरक संगोष्ठी में विचार किया जाता है. वे अपने आलेख का अंत करते हुए कहती हैं----“ वही पीछे छूटा बचपन जब पच्चीसबरस, पचास बरस बाद अपने बच्चे या बच्चे के बच्चे के रूप में खडा हो जाता है तो यह जरूरी एवरेस्ट यह आवश्यक सागर सिकुड़ते हैं और छोटे होते जाते हैं,इतने –इतने छोटे कि नन्हीं- नन्हीं हथेलियों में राजा जी की गैया खो जाती है, मिलती है गुदगुदी में, खिलखिलाहट में—आटे बाटे चने चटाके,चैंऊ-मैऊ, झू झू के पाऊं कर के और वही सवाल कि चल चल चमेली बाग में क्या- क्या खिलाएंगे; सूरज एक पूरा चक्कर लगाकर सुबह- दोपहर शाम को रूप बदलने के बाद फिर वहीं से शुरू हो गई कहानी…. कुछ बदला तो था पर बदला हुआ गया कहां ! वही बच्चा, वही कहानी, वही नानी और एक था राजा , एक थी रानी. दोनों मर गए खत्म कहानी.”
इस संगोष्टी में बालसाहित्य संबंधी उठाए गए मुद्दे बच्चों के भविष्य की ओर इंगत करते थे.एक तरफ जहां सूचना एवं प्रौद्योगिकि की क्रांति से उपजी सूचनापरकता माध्यमों के साहित्य में प्रयोग की बात थी वहीं भारत के उन नौनिहालों कि चिंता थी जिन्हें स्कूल का मुंह भी देखने को नसीब नहीं होता ऐसे में बालसाहित्य की दशा और दिशा निर्धारित करना बेमानी लगता है. चूकि इस दिशा में समग्र रूप से कोई समेकित कार्य नहीं हुआ है इसलिए हर कोई अपनी ढ्पली अपना राग गाए चला जा रहा है. फिर भी अंधेरी रात में जुगनू की चमक ही भरपूर लगती है. लेकिन फिर भी अगर-मगर करते हुए चला जाय तो मंजिल मिलेगी ही मिलेगी.
शमशेर अहमद खान, 2-सी, प्रैस ब्लाक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस दिल्ली---110054.
Shamsher_53@rediffmail.com, ahmedkhan.shamsher@gmail.com
Friday, June 5, 2009
नन्हा असलम और कुदरती जीव

नन्हे असलम की एक सबसे बढ़िया आदत यह भी है कि स्कूल के होमवर्क को पूरा करने के बाद अपने माता-पिता के संग अपने घर के पिछवाड़े वाले बागीचे में पौधों की देखभाल किया करता है। उसके इस छोटे से बागीचे में कई तरह के फलदार वृक्ष हैं। इस बागीचे की जितनी सेवा वह करता है उतना ही फल वे वृक्ष देते हैं।लेकिन असलम को तब बहुत दुख होता है जब बंदर उत्पात करते हुए न केवल फलों को खाते हैं बल्कि खाने से ज्यादा नष्ट करते हैं। इन बंदरों के किए नुकसान को देखकर वह सोचता रहता है कि आखि्र बंदर शहर में रहते ही क्यों हैं? हालांकि अस्लम कुअदरती जीवों से बहुत प्यार करता है लेकिन उसे बंदरों की शैतानी बिल्कुल ही नहीं भाती।ये शैतानी बंदर न केवल लोगों के बाग-बागीचे उखाड़ते रहते हैं बल्कि लोगों को बिना वजह काटते भी रहते हैं,जिससे उन्हें सूईयां भी लगवानी पड़ती रहती हैं।पिछले दिनों तो हद यह हो गई कि दिल्ली के मेयर को इन बंदरों ने मौत के मुंह में सुला दिया.
Thursday, May 28, 2009
Tuesday, May 26, 2009
Tuesday, May 26, 2009
331वीं गहन हिन्दी कार्यशाला सम्पन्न
भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के केंद्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान के 2-ए, पृथ्वीराज रोड, नई दिल्ली स्थित अल्पकालिक गहन प्रशिक्षण एकक द्वारा 331वीं गहन हिन्दी कार्यशाला का समापन समारोह सम्पन्न हुआ जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व सचिव श्री चंद्रधर त्रिपाठी एवं राजभाषा विभाग के संयुक्त सचिव श्री दिलीप कुमार पाण्डेय और संयुक्त निदेशक श्री एस॰एम॰ दोहरे उपस्थित थे। यह कार्यशाला दिनांक 18॰05॰2009 से 22॰05॰2009 तक आयोजित की गई जिसमें देशभर के विभिन्न केंद्रीय कार्यालयों के कार्मिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे। इस अवसर पर कार्यशाला के प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र तथा हिन्दी की सी॰डी॰ उपलब्ध करवाई गई।(प्रतिभागियों को संबोधित करते मुख्य अतिथि)
प्रकाशक-- नियंत्रक । Admin at 6:43 PM
समाचार-वर्ग-- Chandradhar Tripathi,
Dilip Kumar Pandey,
Govt of India,
Home Ministry,
Kendriya Hindi Prashikshan Sansthan,
New Delhi,
Rajbhasha Vibhag,
S M Dohre,
Workshop
खटिमा में हुआ बालसाहित्यकारों का सम्मेलन
राष्ट्रपति से बालसाहित्यकारों एवं बालकल्याण से जुड़े प्रतिनिधियों की भेंट और बालसाहित्य संरक्षण के प्रस्ताव
खटिमा में हुआ बालसाहित्यकारों का सम्मेलन
राष्ट्रपति से बालसाहित्यकारों एवं बालकल्याण से जुड...
Sunday, May 24, 2009
test post
'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने शन्नो अग्रवाल की आवाज़ में श्रवण कुमार सिंह की कहानी 'बुतरखौकी' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं सआदत हसन मंटो की "कसौटी", जिसको स्वर दिया है "किस से कहें" वाले अमिताभ मीत ने। इससे पहले आप अनुराग शर्मा की आवाज़ में मंटो की अमर कहानी टोबा टेक सिंह और एक लघुकथा सुन चुके हैं।
"कसौटी" का कुल प्रसारण समय १३ मिनट और ४४ सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।
यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें।
"कसौटी" का कुल प्रसारण समय १३ मिनट और ४४ सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।
यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें।
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